दीपक विश्वकर्मा…(स्टेट हेड मध्यप्रदेश)
- क्या जनता के लिए अलग नियम और नेताओं के लिए अलग?
उमरिया। एक तरफ देश के प्रधानमंत्री जनता से पेट्रोल-डीजल बचाने, पर्यावरण संरक्षण और अनावश्यक ईंधन खपत रोकने की अपील कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्हीं संदेशों को धरातल पर लागू करने की जिम्मेदारी संभालने वाले जनप्रतिनिधियों के आचरण पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
उमरिया जिले के ग्राम भीमाडोंगरी और अमिलिया में आयोजित “ईंधन बचाओ अभियान” के दौरान मध्यप्रदेश के अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री एवं जिले के प्रभारी मंत्री नागर सिंह चौहान कथित रूप से 15 से 20 वाहनों के लंबे काफिले के साथ पहुंचे। विडंबना यह रही कि जिस कार्यक्रम का उद्देश्य ईंधन बचत का संदेश देना था, उसी कार्यक्रम में भारी संख्या में वाहनों का उपयोग लोगों के बीच चर्चा और आलोचना का विषय बन गया।
मंच से ईंधन बचाने की नसीहत, सड़क पर ईंधन की खुली खपत?
ग्रामीणों और स्थानीय लोगों के बीच यह सवाल चर्चा में रहा कि आखिर जब सरकार स्वयं ईंधन बचाने की बात कर रही है, तब मंत्री और प्रशासनिक अमला इस संदेश का पालन क्यों नहीं करता? यदि एक कार्यक्रम में पहुंचने के लिए 15–20 गाड़ियों का काफिला निकलता है, तो उसमें खर्च हुए ईंधन का हिसाब कौन देगा?
सरकारी खजाने पर बोझ या वीआईपी संस्कृति का प्रदर्शन?
आलोचकों का कहना है कि इस तरह के काफिले न केवल ईंधन की अनावश्यक खपत बढ़ाते हैं बल्कि सरकारी संसाधनों पर भी अतिरिक्त बोझ डालते हैं। ऐसे समय में जब आम आदमी पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से परेशान है, तब नेताओं के भव्य काफिले जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा प्रतीत होते हैं।
क्या अभियान सिर्फ फोटो और भाषण तक सीमित हैं?
जनता के बीच यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि कई सरकारी अभियान केवल भाषणों और फोटो सेशन तक सीमित रह गए हैं। यदि अभियान चलाने वाले ही उसके मूल उद्देश्य का पालन नहीं करेंगे, तो जनता पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
उठता बड़ा सवाल
क्या “ईंधन बचाओ अभियान” केवल आम नागरिकों के लिए है?
क्या मंत्री और वीआईपी वर्ग इस जिम्मेदारी से मुक्त हैं?
क्या सरकार अपने मंत्रियों और अधिकारियों के काफिलों की संख्या सीमित करने के लिए कोई नीति बनाएगी?
जनता पूछ रही है जवाब
उमरिया में सामने आई यह तस्वीर एक बार फिर उस दोहरे मापदंड की ओर इशारा करती है, जहां जनता को त्याग और बचत का पाठ पढ़ाया जाता है, जबकि सत्ता के गलियारों में उसी संदेश की खुलेआम अनदेखी होती दिखाई देती है।
“ईंधन बचाओ अभियान” के बीच निकला लंबा काफिला अब अभियान से ज्यादा चर्चा का विषय बन चुका है, और जनता जानना चाहती है कि आखिर उपदेश और व्यवहार में इतना बड़ा अंतर क्यों है?






















